श्रीधर अग्निहोत्री
लखनऊ। नाना पाटेकर का नाम आते ही एक चेहरा सामने आता जो कठोर, गंभीर और भीतर तक उतर जाने वाली आंखों वाला। एक ऐसी आवाज, जिसमें गुस्सा भी दिखता था, दर्द भी और सच कहने का साहस भी। हिंदी सिनेमा में बहुत कम कलाकार ऐसे हुए हैं, जिनकी मौजूदगी पर्दे पर आते ही कहानी का तापमान बदल देती है। नाना पाटेकर उन्हीं में से एक थे।
मराठी रंगमंच से शुरू हुआ उनका सफर धीरे-धीरे हिंदी फिल्मों तक पहुंचा। अंकुश, प्रतिघात, परिंदा, क्रांतिवीर, अग्निसाक्षी, यशवंत और अब तक छप्पन जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय के अलग-अलग रंग दिखाए। परिंदा के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला और क्रांतिवीर ने उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया। लेकिन नाना की असली पहचान पुरस्कारों से नहीं, उनके अभिनय की उस बेचैनी से बनी जो दर्शक को भीतर तक झकझोर देती है।
वह संवाद नहीं बोलते, जैसे किरदार के भीतर जमा हुआ लावा बाहर निकालते थे। उनकी आवाज का उतार-चढ़ाव, चेहरे की कठोरता और आंखों की भाषा कई बार शब्दों से ज्यादा प्रभाव पैदा करती । उनके अभिनय में बनावट कम और जीवन की खुरदरी सच्चाई ज्यादा दिखाई देती। लेकिन जिस कलाकार का अभिनय इतना प्रभावशाली रहा, उसका निजी व्यक्तित्व हमेशा उतना निर्विवाद नहीं रहा। समय-समय पर उनके व्यवहार और निजी जीवन को लेकर चर्चाएं और विवाद सामने आते रहे। इनमें सबसे चर्चित प्रसंग अभिनेत्री तनुश्री दत्ता का रहा।
तनुश्री दत्ता ने 2018 में 2008 की फिल्म Horn ‘Ok’ Pleassss की शूटिंग के दौरान नाना पाटेकर पर अनुचित व्यवहार के गंभीर आरोप लगाए। नाना ने इन आरोपों से इनकार किया। पुलिस जांच के बाद उनके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने की बात सामने आई और बाद में अदालत में भी मामला समाप्त हुआ। इसलिए इस प्रकरण को आरोप और जवाब के रूप में ही देखा जाना चाहिए, सिद्ध तथ्य के रूप में नहीं।
नाना पाटेकर का निजी जीवन भी हमेशा चर्चा में रहा। अभिनेत्री मनीषा कोइराला के साथ उनके संबंधों को लेकर कभी मीडिया में चर्चाएं हुईं, तो पत्नी नीलकांति पाटेकर से लंबे समय से अलग रहने की खबरें भी आती रहीं। लेकिन इन निजी प्रसंगों को उनके चरित्र पर फैसला सुनाने का आधार मानना उचित नहीं होगा।
नाना पाटेकर के व्यक्तित्व पर उंगलियां उठती रहीं, लेकिन उनके अभिनय की शक्ति पर सवाल उठाना मुश्किल रहा। पर्दे पर वह जब किसी किरदार में प्रवेश करते तो नाना पाटेकर पीछे छूट जाते हैं और सामने केवल वह चरित्र रह जाता।
शायद यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि रही। उन्होंने अभिनय को पेशा नहीं, एक ऐसी अनुभूति बना दिया जिसमें कलाकार दिखाई नहीं देता, केवल किरदार दिखाई देता है।
